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देवता: इन्द्रः ऋषि: इरिम्बिठिः छन्द: गायत्री स्वर: सूक्त-५

अ॒यमु॑ त्वा विचर्षणे॒ जनी॑रिवा॒भि संवृ॑तः। प्र सोम॑ इन्द्र सर्पतु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अयम् । ऊं इति । त्वा । विऽचर्षणे । जनी:ऽइव । अभि । सम्ऽवृत: ॥ प्र । सोम: । इन्द्र । सर्पतु ॥५.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:5» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सोम रस के सेवन का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (विचर्षणे) हे दूरदर्शी (इन्द्र) इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले पुरुष] (अयम् उ) यही (अभि) सब प्रकार (संवृतः) यथाविधि स्वीकार किया हुआ (सोमः) सोम [महौषधियों का रस], (जनीः इव) कुलस्त्रियों के समान, (त्वा) तुझको (प्र) अच्छे प्रकार (सर्पतु) प्राप्त होवे ॥१॥
भावार्थभाषाः - जैसे कुलस्त्रियाँ अपने सन्तान आदि का हित करती हैं, वैसे ही सद्वैद्यों का सिद्ध किया हुआ महौषधियों का रस सुखदायक होता है ॥१॥
टिप्पणी: मन्त्र १-७ ऋग्वेद में है-८।१७।६-१३ ॥ १−(अयम्) (उ) एव (त्वा) त्वाम् (विचर्षणे) कृषेरादेश्च चः। उ० २।१०४। वि+कृष विलेखने-अनि, कस्य चः। विचर्षणिः पश्यतिकर्मा-निघ० ३।११। हे विविधं द्रष्टः। दूरदर्शिन् (जनीः) जनयः। कुलस्त्रियः (इव) यथा (अभि) अभितः। सर्वप्रकारेण (संवृतः) सम्यक् स्वीकृतः (प्र) प्रकर्षेण (सोमः) महौषधिरसः (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् पुरुष (सर्पतु) प्राप्नोतु ॥