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देवता: सूर्यः ऋषि: प्रस्कण्वः छन्द: गायत्री स्वर: सूक्त-४७
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स॒प्त त्वा॑ ह॒रितो॒ रथे॒ वह॑न्ति देव सूर्य। शो॒चिष्के॑शं विचक्ष॒णम् ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सप्त । त्वा । हरित: । रथे । वहन्ति । देव । सूर्य ॥ शोचि:ऽकेशम् । विऽचक्षणम् ॥४७.२०॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:47» पर्यायः:0» मन्त्र:20


पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

१३-२१। परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (देव) हे चलनेवाले (सूर्य) सूर्य ! [रविमण्डल] (सप्त) सात [शुक्ल, नील, पीत, रक्त, हरित, कपिश, चित्र वर्ण वाली] (हरितः) आकर्षक किरणें (शोचिष्केशम्) पवित्र प्रकाशवाले (विचक्षणम्) विविध प्रकार दिखानेवाले (त्वा) तुझको (रथ) रथ [गमन विधान] में (वहन्ति) ले चलती हैं ॥२०॥
भावार्थभाषाः - यह प्रकाशमान सूर्यलोक, शुक्ल, नील, पीत आदि सात किरणों द्वारा अपनी धुरी पर अपने घेरे में घूमता है। इस नियम का बनानेवाला वह परमेश्वर है ॥२०॥
टिप्पणी: १३-२१−एते मन्त्रा व्याख्याताः-अ० १३।२।१६-२४ ॥