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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
महौषधियों के रसपान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (सोमः) सोम [उत्तम ओषधियों का रस] (ते) तेरे (संसुदे) स्वीकार करने के लिये (स्वादुः) स्वादु [रोचक] और (तव) तेरे (तन्वे) शरीर के लिये (मधुमान्) मधुर रसवाला (अस्तु) होवे और (ते) तेरे (हृदे) हृदय के लिये (शम्) शान्तिकारक (अस्तु) होवे ॥३॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ऐसी उत्तम ओषधियों का रससेवन करें जो खाने में स्वादिष्ट हों, शरीर को पुष्ट और हृदय को शान्त करें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(स्वादुः) रोचकः (ते) तव (अस्तु) (संसुदे) षूद आश्रुतिहत्योः-क्विप्, छान्दसो ह्रस्वः, आश्रुतिरङ्गीकारः। सम्यक् स्वीकरणाय (मधुमान्) माधुर्योपेतः (तन्वे) शरीराय (तव) (सोमः) सदौषधिरसः (तन्वे) शरीराय (शम्) सुखकरः (अस्तु) (ते) तव (हृदे) हृदयाय ॥
