0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
महौषधियों के रसपान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (ते) तेरी (कुक्ष्योः) दोनों कोखों में (मधु) मधुर पान को (आ) भली-भाँति (सिञ्चामि) मैं सींचता हूँ, वह (गात्रा अनु) [तेरे] अङ्गों में (वि धावतु) दौड़ने लगे, [इसको] (जिह्वया) जीभ से (गृभाय) ग्रहण कर ॥२॥
भावार्थभाषाः - सद्वैद्य रुधिरसंचारक ओषधियों का सेवन कराके मनुष्यों को पुष्ट रक्खें ॥२॥
टिप्पणी: २−(आ) समन्तात् (ते) तव (सिञ्चामि) अवनयामि। पूरयामि (कुक्ष्योः) सव्यदक्षिणपार्श्वयोः (अनु) प्रति (गात्रा) अङ्गानि (वि) विविधम्। सर्वत्र (धावतु) प्रवहतु (गृभाय) श्नः शायजादेशः, हस्य भः। गृहाण (जिह्वया) रसनया (मधु) मधुरपानम् ॥
