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देवता: इन्द्रः ऋषि: इरिम्बिठिः छन्द: गायत्री स्वर: सूक्त-४

आ ते॑ सिञ्चामि कु॒क्ष्योरनु॒ गात्रा॒ वि धा॑वतु। गृ॑भा॒य जि॒ह्वया॒ मधु॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आ । ते । सिञ्चामि । कुक्ष्यो: । अनु । गात्रा । वि । धावतु ॥ गृभाय । जिह्वया । मधु ॥४.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:4» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

महौषधियों के रसपान का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (ते) तेरी (कुक्ष्योः) दोनों कोखों में (मधु) मधुर पान को (आ) भली-भाँति (सिञ्चामि) मैं सींचता हूँ, वह (गात्रा अनु) [तेरे] अङ्गों में (वि धावतु) दौड़ने लगे, [इसको] (जिह्वया) जीभ से (गृभाय) ग्रहण कर ॥२॥
भावार्थभाषाः - सद्वैद्य रुधिरसंचारक ओषधियों का सेवन कराके मनुष्यों को पुष्ट रक्खें ॥२॥
टिप्पणी: २−(आ) समन्तात् (ते) तव (सिञ्चामि) अवनयामि। पूरयामि (कुक्ष्योः) सव्यदक्षिणपार्श्वयोः (अनु) प्रति (गात्रा) अङ्गानि (वि) विविधम्। सर्वत्र (धावतु) प्रवहतु (गृभाय) श्नः शायजादेशः, हस्य भः। गृहाण (जिह्वया) रसनया (मधु) मधुरपानम् ॥