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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
महौषधियों के रसपान का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे इन्द्र राजन् !] (अस्माकम्) हमारी (सुष्टुतीः) सुन्दर स्तुतियों को (उप=उपेत्य) प्राप्त होकर (सुतावतः) उत्तम पुत्र आदि [सन्तानों] वाले (नः) हम लोगों को (आ याहि) आकर प्राप्त हो। (सुशिप्रिन्) हे दृढ़ जबड़ेवाले ! (अन्धसः) इस अन्न रस का (सु) भले प्रकार (पिब) पान कर ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सुन्दर महौषधियों के रस के सेवन से हृष्ट-पुष्ट होवें ॥१॥
टिप्पणी: यह तृच ऋग्वेद में है-८।१७।४-६ ॥ १−(आ) आगत्य (नः) अस्मान् (याहि) प्राप्नुहि (सुतावतः) उत्तमसन्तानयुक्तान् (अस्माकम्) (सुष्टुतीः) शोभनाः स्तुतीः (उप) उपेत्य (पिब) पानं कुरु (सु) सुष्ठु (शिप्रिन्) स्फायितञ्चिवञ्चि०। उ० २।१३। शिञ् निशाने छेदने-रक्, पुक् च, यद्वा सृप्लृ गतौ-रक्, सृशब्दस्य शिभावः। शिप्रे हनूनासिके वा-निरु० ६।१७। हे दृढहनूयुक्त (अन्धसः) अन्नरसस्य ॥
