अ॒स्मा इदु॒ प्र त॒वसे॑ तु॒राय॒ प्रयो॒ न ह॑र्मि॒ स्तोमं॒ माहि॑नाय। ऋची॑षमा॒याध्रि॑गव॒ ओह॒मिन्द्रा॑य॒ ब्रह्मा॑णि रा॒तत॑मा ॥
पद पाठ
अस्मै । इत् । ऊं इति । प्र । तवसे । तुराय । प्रय: । न । हर्मि । स्तोमम् । माहिनाय ॥ ऋचीषमाय । अध्रिऽगवे । ओहम् । इन्द्राय । ब्रह्माणि । रातऽतमा ॥३५.१॥
अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:35» पर्यायः:0» मन्त्र:1
0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सभापति के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अस्मै) इस [संसार] के हित के लिये (इत्) ही (उ) विचारपूर्वक (तवसे) बल के निमित्त, (तुराय) फुरतीले, (माहिनाय) पूजनीय, (ऋचीषमाय) स्तुति के समान गुणवाले, (अध्रिगवे) बेरोक गतिवाले, (इन्द्राय) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले सभापति] के लिये (स्तोमम्) स्तुति को, (ओहम्) पूरे विचार को और (राततमा) अत्यन्त देने योग्य (ब्रह्माणि) धनों को (प्रयः न) तृप्ति करनेवाले अन्न के समान (प्र हर्मि) मैं आगे लाता हूँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को चाहिये कि पूजनीय, उत्तम गुणवाले, अति बुद्धिमान् राजा आदि प्रधान पुरुषों का धन आदि से सत्कार करें और प्रधान लोग भी इसी प्रकार उनका आदर करें ॥१॥
टिप्पणी: यह सूक्त ऋग्वेद में है-१।६१।१-१६॥१−(अस्मै) परिदृश्यमानस्य संसारस्य हिताय (इत्) एव (उ) वितर्के। विचारे (प्र) (नवसे) अ०४।३२।३। बलार्थम् (तुराय) तुर त्वरणे-कप्रत्ययः। वेगवते (प्रयः) सर्वधातुभ्य असुन्। उ०४।१८९। प्रीञ् तर्पणे-असुन्। प्रीतिकरम् अन्नम्-निघ०२।७। (न) यथा (हर्मि) शपो लुक्। हरामि। नयामि (स्तोमम्) स्तुतिम् (माहिनाय) महेरिनण् च। उ०२।६। मह पूजायाम्-इनण्। पूजनीयाय (ऋचीषमाय) इगुपधात् कित्। उ०४।१२०। ऋच स्तुतौ-इन्, कित् ङीप्+षम अवैकल्यै-अच्। ऋचीषम् ऋचा समः-निरु०६।२३। ऋचा स्तुत्या तुल्याय। स्तुतितुल्यगुणवते (अध्रिगवे) भुजेः किच्च। उ०४।
