परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जिस [परमेश्वर] ने (अहिम्) सब ओर चलनेवाले मेघ में (हत्वा) व्यापकर (सप्त) सात (सिन्धून्) बहते हुए समुद्रों [अर्थात् भूर् भुवः आदि सात अवस्थावाले सब लोकों] को (अरिणात्) चलाया है, (वलस्य) बल [सामर्थ्य] के (अपधा) हर्ष से धारण करनेवाले (यः) जिसने (गाः) पृथिवियों को (उदाजत्) उत्तमता से चलाया है। (समत्सु) संग्रामों के बीच (संवृक्) शत्रुओं के रोकनेवाले (यः) जिसने (अश्मनोः) दो व्यापक मेघों वा पत्थरों के (अन्तः) बीच (अग्निम्) अग्नि [बिजुली] को (जजान) उत्पन्न किया है, (जनासः) हे मनुष्यो ! (सः) वह (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला परमेश्वर] है ॥३॥
भावार्थभाषाः - भूर्, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य, सात लोक संसार की अवस्था विशेष हैं। परमेश्वर मेघ आदि पदार्थों और सात अवस्थावाले समस्त संसार में व्यापकर पृथिवी आदि लोकों को आकर्षण में रखकर, मेघ पाषाण आदि सब वस्तुओं में बिजुली धारण करके परमाणुओं के संयोग-वियोग से अनन्त रचना करता है, उसको जानकर मनुष्य वृद्धि करें ॥३॥