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देवता: हरिः ऋषि: अष्टकः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: सूक्त-३३

प्रोग्रां पी॒तिं वृष्ण॑ इयर्मि स॒त्यां प्र॒यै सु॒तस्य॑ हर्यश्व॒ तुभ्य॑म्। इन्द्र॒ धेना॑भिरि॒ह मा॑दयस्व धी॒भिर्विश्वा॑भिः॒ शच्या॑ गृणा॒नः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । उग्राम् । पीतिम् । वृष्णे । इयर्मि । सत्याम् । प्रऽयै । सुतस्य । हरिऽअश्व । तुभ्यम् ॥ इन्द्र । धेनाभि: । इह । मादयस्व । धीभि: । विश्वाभि: । शच्या । गृणान: ॥३३.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:33» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (हर्यश्व) हे वायुसमान फुरतीले घोड़ोंवाले ! (वृष्णे तुभ्यम्) तुझ महाबली को (प्रयै) आगे चलने के लिये (सुतस्य) निचोड़ [सिद्धान्त] का (उग्राम्) तीव्र, (सत्यम्) सत्यगुणवाला (पीतिम्) घूँट (प्र इयर्मि) आगे रखता हूँ। (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले विद्वान्] (धेनाभिः) वेदवाणियों द्वारा (इह) यहाँ पर (विश्वाभिः) समस्त (धीभिः) बुद्धियों से और (शच्या) कर्म से (गृणानः) उपदेश करता हुआ तू (मादयस्व) आनन्द दे ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य फुरतीली सेनावाला ज्ञानवान् और बलवान् हो, सब लोग आदर करके उस बुद्धिमान् कर्मकुशल की वैदिक शिक्षाओं से आनन्द पावें ॥२॥
टिप्पणी: यह मन्त्र ऊपर आ चुका है-अ०२०।२।७॥२-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ०२०।२।७॥