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स्रुवे॑व यस्य॒ हरि॑णी विपे॒ततुः॒ शिप्रे॒ वाजा॑य॒ हरि॑णी॒ दवि॑ध्वतः। प्र यत्कृ॒ते च॑म॒से मर्मृ॑ज॒द्धरी॑ पी॒त्वा मद॑स्य हर्य॒तस्यान्ध॑सः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

स्रुवाऽइव । यस्‍य । हरिणी इति । विऽपेततु: । शिप्रे इति । वाजाय । हरिणी इति ।‍ दविध्वत: ॥ प्र । यत् । कृते । चमसे । मर्मृजत् । हरी इति । पीत्वा । मदस्य । हर्यतस्य । अन्धस: ॥३१.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:31» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

पुरुषार्थ करने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (वाजाय) अन्न के लिये (यस्य) जिस [सेनापति] के (हरिणी) स्वीकार करने योग्य (शिप्रे) दोनों जावड़े (स्रुवा इव) दो चमचाओं के समान (विपेततुः) विविध प्रकार चलते हैं, [उसके राज्य में] (हरिणी) सुख हरनेवाली [अविद्या और कुनीति] दोनों (दविध्वतः) सर्वथा मिट जाती हैं। (यत्) क्योंकि वह (चमसे कृते) भोजन सिद्ध होने पर (मदस्य) आनन्ददायक, (हर्यतस्य) कामनायोग्य (अन्धसः) अन्न का (पीत्वा) पान करके (हरी) बल और पराक्रम दोनों को (प्र) अच्छे प्रकार (मर्मृजत्) शुद्ध करता है ॥४॥
भावार्थभाषाः - जैसे अन्न खाने से भूख मिटती है और स्रुवा से अग्नि में घी डालने से धुआँ नष्ट हो जाता है, वैसे ही जो राजा विद्या और सुनीति के फैलाने से अविद्या और कुनीति मिटाता है, वह अन्न के भोजन से बल और पराक्रम बढ़ाता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(स्रुवा) स्रुवौ। चमसौ (इव) यथा (यस्य) सेनापतेः (हरिणी) हृञ् स्वीकारे-इनच्, उ०२।४६। स्वीकरणीये (विपेततुः) लङर्थे लिट्। विविधं पततश्चलतः (शिप्रे) अथर्व-२०।४।१। शिञ् निशाने छेदने-रक् पुक्च, टाप्। शिप्रे हनू नासिके वा-निरु०६।१७। हनू (वाजाय) अन्नाय (हरिणी) हृञ् नाशने-इनच्। सुखनाशिके अविद्याकुनीती (दविध्वतः) दाधर्तिदर्धर्ति०। पा०७।४।६। ध्वृ कौटिल्ये यङ्लुकि लट् द्विवचनान्तः। ध्वरति वधकर्मा-निघ०२।१६। सर्वथा विनश्यतः (प्र) प्रकर्षेण (यत्) यत् (कृते) संस्कृते (चमसे) भोजने (मर्मृजत्) मृजू शुद्धौ-लट्। मार्ष्टि। शोधयति (हरी) दुःखहर्तारौ बलपराक्रमौ (पीत्वा) पानं कृत्वा (मदस्य) आनन्दकस्य (हर्यतस्य) कमनीयस्य (अन्धसः) अन्नस्य॥