0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले सेनापति] (उत्सिसृप्सतः) उछलते हुए और (द्याम्) आकाश को (आरुरुक्षतः) चढ़ते हुए (दस्यून्) डाकुओं को तूने (मायाभिः) अपनी बुद्धियों से (अव अधूनुथाः) ओंधा गिरा दिया है ॥४॥
भावार्थभाषाः - जो शत्रु लोग विमान आदि से आकाश में चढ़कर उपद्रव मचावें, युद्धकुशल सेनापति विमान आदि में चढ़कर उन्हें गिरावें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(मायाभिः) प्रज्ञाभिः (उत्सिसृप्सतः) सृप्लृ गतौ-सनि शतृ। उत्सर्पणेच्छून्। ऊर्ध्वगमनेच्छून् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् सेनापते (द्याम्) आकाशम् (आरुरुक्षतः) रुह प्रादुर्भावे-सनि शतृ। आरोहणेच्छून् (अव) अधोमुखम् (दस्यून्) उपक्षेप्तॄन्। दुष्टान्। चौरान् (अधूनुथाः) धूञ् कम्पने-लङ्। कम्पितवान् प्रेरितवानसि ॥
