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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (केशिना) सुन्दर केशों [कन्धे आदि के बालों] वाले, (हरी) रथ ले चलनेवाले दो घोड़े [के समान बल और पराक्रम] (सुराधसम्) महाधनी (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] को (इत्) ही (सोमपेयाय) ऐश्वर्य की रक्षा के लिये (यज्ञम् उप) यज्ञ [पूजनीय व्यवहार] की ओर (वक्षतः) लावें ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य उत्तम उत्साही पुरुष का श्रेष्ठ वस्तुओं से आदर करके उसके योग्य प्रबन्ध से सुखी होवें ॥२॥
टिप्पणी: इस मन्त्र का मिलान करो-२०।३।२ ॥ २−(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं पुरुषम्। (इत्) एव (केशिना) प्रशस्तकेशयुक्तौ। स्कन्धादिचिक्कणबालोपेतौ (हरी) रथस्य वाहकावश्वाविव बलपराक्रमौ (सोमपेयाय) अचो यत् पा० ३।१।९७। सोम+पा रक्षणे-यत्। ईद्यति। पा० ६।४।६। आकारस्य ईकारः। ऐश्वर्यस्य रक्षणाय (वक्षतः) वह प्रापणे-लेट्। वहताम्। प्रापयताम् (उप) प्रति (यज्ञम्) पूजनीयं व्यवहारम् (सुराधसम्) बहुधनवन्तम् ॥
