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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (त्वम्) तू (हि) ही (स्तोमवर्धनः) स्तुतियों से बढ़ाने योग्य और (उक्थवर्धनः) यथार्थ वचनों से सराहने योग्य (उत) और (स्तोतॄणाम्) गुणव्याख्याताओं का (भद्रकृत्) कल्याण करनेवाला (असि) है ॥१॥
भावार्थभाषाः - राजा ऐसा उत्तम गुणी और पराक्रमी होवे कि सब लोग उसके गुणों से सुखी होवें ॥१॥
टिप्पणी: यह सूक्त ऋग्वेद में है-८।१४।११-१ ॥ १−(त्वम्) (हि) एव (स्तोमवर्धनः) कृत्यल्युटो बहुलम्। पा० ३।३।११३। स्तोम+वृधु वर्धने-अर्हार्थे ल्युट्। स्तुतिभिर्वर्द्धनीयः (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (असि) (उक्थवर्धनः) ल्युट् पूर्ववत्। यथार्थवचनैर्वर्धनीयः (स्तोतॄणाम्) गुणव्याख्यातॄणाम् (उत) अपि च (भद्रकृत्) कल्याणस्य कर्ता ॥
