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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (ते) तेरी (स्तोमः) बड़ाई (अपाम्) जलों की (मदन्) हर्ष बढ़ानेवाली (ऊर्मिः इव) लहर के समान (अजिरायते) वेग से चलती है, और (मदाः) आनन्द (वि अराजिषुः) विराजते हैं [विविध प्रकार ऐश्वर्य बढ़ाते हैं] ॥४॥
भावार्थभाषाः - न्यायकारी जगदीश्वर की उत्तम नीति को मानकर सब लोग आनन्द पाकर शीघ्र ऐश्वर्य बढ़ावें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(अपाम्) जलानाम् (ऊर्मिः) तरङ्गः (मदन्) आनन्दयन् (इव) यथा (स्तोमः) स्तुतिः (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् (अजिरायते) अजिरशिशिरशिथिल०। उ० १।३। अज गतिक्षेपणयोः-किरच्। अजिरं क्षिप्रनाम-निघ० २।१। तत्करोतीत्युपसंख्यानं सूत्रयत्याद्यर्थम्। वा० पा०। ३।१।२६। अजिर-णिच्, सांहितिको दीर्घः। अजिरं क्षिप्रं करोति। शीघ्रं गच्छति (वि) विविधम् (ते) तव (मदाः) आनन्दाः (अराजिषुः) लङर्थे लुङ्। राजतीति ऐश्वर्यकर्मा-निघ० २।२१। ऐश्वर्यं वर्धयन्ति। शोभन्ते ॥
