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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रेण) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा] करके (दिवः) व्यवहार के (स्थिराणि) ठहराऊ (रोचना) प्रकाश (न पराणुदे) न हटने के लिये (दृढानि) पक्के किये गये (च) और (दृंहितानि) बढ़ाये गये [फैलाये गये] हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा ने अपने अटल नियमों से सब संसार को सुख दिया है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(इन्द्रेण) परमैश्वर्यवता परमात्मना (रोचना) रोचनानि। प्रकाशाः (दिवः) व्यवहारस्य (दृढानि) दृह वृद्धौ-क्त। दृढीकृतानि (दृंहितानि) दृहि वृद्धौ-क्त। वर्धितानि। विस्तारितानि (च) (स्थिराणि) स्थितिशीलानि (न) निषेधे (पराणुदे) परा+णुद प्रेरणे-क्विप्। परानोदनाय। दूरे प्रेरणाय ॥
