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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
परमेश्वर की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मा] ने (सोमस्य) ऐश्वर्य के (मदे) आनन्द में (रोचना) प्रीति के साथ (अन्तरिक्षम्) आकाश को (वि अतिरत्) पार किया है, (यत्) जब कि उसने (वलम्) हिंसक [विघ्न] को (अभिनत्) तोड़ डाला ॥१॥
भावार्थभाषाः - सबसे महान् और पूजनीय परमेश्वर की उपासना से सब मनुष्य उन्नति करें ॥१॥
टिप्पणी: यह सूक्त ऋग्वेद में है-८।१४।७-१० और आगे है-अ० २०।३९।२-। मन्त्र १, २ सामवेद में है-उ० ८।१। तृच ९ ॥ १−(वि) विविधम् (अन्तरिक्षम्) आकाशम् (अतिरत्) पारं कृतवान् (मदे) आनन्दे (सोमस्य) ऐश्वर्यस्य (रोचना) विभक्तेराकारः। रोचनया। प्रीत्या (इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् परमात्मा (यत्) यदा (अभिनत्) व्यदारयत् (वलम्) हिंसकं विघ्नम् ॥
