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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (वावृधानस्य) बढ़ते हुए और (विश्वा) सब (धनानि) धनों को (जिग्युषः) जीत चुकनेवाले (ते) तेरी (ऊतिम्) रक्षा को (वयम्) हम (आ) सब ओर से (वृणीमहे) माँगते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - जब राजा पराक्रमी और धनी होता है, तब प्रजागण सुरक्षित रहकर उस राज्य की वृद्धि चाहते हैं ॥६॥
टिप्पणी: ६−(वावृधानस्य) वर्धमानस्य (ते) तव (वयम्) प्रजाजनाः (विश्वा) सर्वाणि (धनानि) (जिग्युषः) जि जये-क्वसु। जितवतः (ऊतिम्) रक्षाम् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (आ) समन्तात् (वृणीमहे) याचामहे ॥
