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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञः) यज्ञ [विद्वानों के सत्कार, सत्सङ्ग और विद्या आदि दान] ने (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] को (अवर्धयत्) बढ़ाया है, (यत्) जब कि (दिवि) व्यवहार के बीच (ओपशम्) पूरा उद्योग (चक्राणः) कर चुकते हुए उसने (भूमिम्) भूमि को (वि अवर्तयत्) व्याख्यात किया है ॥॥
भावार्थभाषाः - जब मनुष्य पृथिवी पर प्रत्येक काम को योग्यता से करता है, तब वह उन्नति करके कीर्ति पाता है ॥॥
टिप्पणी: यह मन्त्र सामवेद में है पू० २।३।७ तथा उ० ८।१।९ ॥ −(यज्ञः) देवपूजासंगतिकरणविद्यादिदानव्यवहारः (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं पुरुषम् (अवर्धयत्) वर्धितवान् (यत्) यदा (भूमिम्) (वि अवर्तयत्) विवृतां व्याख्यातां कृतवान् (चक्राणः) करोतेः-कानच्। कृतवान् सन् (ओपशम्) अ० ६।१३८।१। आङ्+उप+शीङ् शयने-ड। ओपशः-उपशयः=उपयोगः। समन्तादुपयोगम् (दिवि) व्यवहारे ॥
