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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शचीपते) हे बुद्धि के स्वामी ! [राजन्] (अस्मै) इस (मनीषिणे) बुद्धिमान् [ब्रह्मचारी] को (शिक्षेयम्) मैं शिक्षा करूँ और (दित्सेयम्) दान दूँ, (यत्) जो (अहम्) मैं (गोपतिः) विद्या का स्वामी (स्याम्) हो जाऊँ ॥२॥
भावार्थभाषाः - बुद्धिमान् राजा आदि धनी लोग प्रबन्ध करें कि ब्रह्मचारी लोग निश्चिन्त होकर उत्तम शिक्षकों से उत्तम विद्या पावें ॥२॥
टिप्पणी: २−(शिक्षेयम्) शिक्षां दद्याम् (अस्मै) उपस्थिताय (दित्सेयम्) दा दाने-सन् प्रत्ययः। दातुमिच्छेयम् (शचीपते) अ० ३।१०।१२। शच व्यक्तायां वाचि-इन्, ङीप्। शची प्रज्ञानाम-निघ० ३।९। हे बुद्धिस्वामिन् (मनीषिणे) बुद्धिमते ब्रह्मचारिणे (यत्) यदि (अहम्) पुरुषः (गोपतिः) गोर्विद्यायाः स्वामी (स्याम्) भवेयम् ॥
