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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
४-६ परमेश्वर के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (तस्थुषः) मनुष्यादि प्राणियों और लोकों में (परि) सब ओर से (चरन्तम्) व्यापे हुए, (ब्रध्नम्) महान् (अरुषम्) हिंसारहित [परमात्मा] को (रोचना) प्रकाशमान पदार्थ (दिवि) व्यवहार के बीच (युञ्जन्ति) ध्यान में रखते और (रोचन्ते) प्रकाशित होते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमाणुओं से लेकर सूर्य आदि लोक और सब प्राणी सर्वव्यापक, सर्वनियन्ता परमात्मा की आज्ञा को मानते हैं, उसीकी उपासना से मनुष्य पदार्थों का ज्ञान प्राप्त करके आत्मा की उन्नति करें ॥४॥
टिप्पणी: मन्त्र ४-६ ऋग्वेद में है-१।६।१-३, सामवेद में-उ० ६।३। तृच १४ और आगे हैं-अ० २०।४७।१०-१२ तथा ६९।९-११। मन्त्र ४, यजुर्वेद में है-२३।, ६ और मन्त्र ४ महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका उपासनाविषय में व्याख्यात है ॥ ४−(युञ्जन्ति) युज समाधौ। ध्यायन्ति (ब्रध्नम्) अ० ७।२२।२। महान्तम्-निघ० ३।३। (अरुषम्) रुष हिंसायाम्-अप्रत्ययः। अहिंसकम् (चरन्तम्) व्याप्नुवन्तम् (परि) सर्वतः (तस्थुषः) तिष्ठतेः क्वसुः शसि रूपम्। तस्थुष इति मनुष्यनाम-निघ० २।३। मनुष्यादिप्राणिनो लोकांश्च (रोचन्ते) प्रकाशन्ते (रोचना) रुच दीप्तावभिप्रीतौ च-युच्, शेर्लोपः। रोचनानि। प्रकाशमानानि वस्तूनि (दिवि) व्यवहारे ॥
