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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
१-३ सेनाध्यक्ष के लक्षण का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यदि) जो वह (आ गमत्) आवे, (घ) तो वह (सहस्रिणीभिः) सहस्रों उत्तम पदार्थ पहुँचानेवाली (ऊतिभिः) रक्षाओं से (वाजेभिः) अन्नों के साथ (नः) हमारी (हवम्) पुकार को (उप) आदर से (श्रवत्) सुने ॥२॥
भावार्थभाषाः - सेनाध्यक्ष को चाहिये कि दूरदर्शी होकर आवश्यक अन्न आदि पदार्थों का संग्रह करके सबकी यथावत् रक्षा करे ॥२॥
टिप्पणी: मन्त्र २, ३ ऋग्वेद में है-१।३०।८, ९, और सामवेद में है-उ० १।२। तृच ११ ॥ २−(आ गमत्) गमेर्लेटि अडागमः। आगच्छेत् (यदि) चेत् (श्रवत्) शृणोतेर्लेटि अडागमः। शृणुयात् (सहस्रिणीभिः) प्रशमार्थ इनिः। सहस्राणि प्रशस्तानि पदार्थप्रापणानि यासु ताभिः (ऊतिभिः) रक्षाभिः (वाजेभिः) अन्नैः (उप) पूजायाम् (नः) अस्माकम् (हवम्) आह्वानम् ॥
