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देवता: इन्द्रः ऋषि: शुनःशेपः छन्द: गायत्री स्वर: सूक्त-२६

योगे॑योगे त॒वस्त॑रं॒ वाजे॑वाजे हवामहे। सखा॑य॒ इन्द्र॑मू॒तये॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

योगेऽयोगे । तव:ऽतरम् । वाजेऽवाजे । हवामहे ॥ सखाय: । इन्द्रम् । ऊतये ॥२६.१॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:26» पर्यायः:0» मन्त्र:1


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

१-३ सेनाध्यक्ष के लक्षण का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (योगेयोगे) अवसर-अवसर पर और (वाजेवाजे) सङ्ग्राम-सङ्ग्राम के बीच (तवस्तरम्) अधिक बलवान् (इन्द्रम्) इन्द्र [परम ऐश्वर्यवान् पुरुष] को (ऊतये) रक्षा के लिये (सखायः) मित्र लोग हम (हवामहे) पुकारते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - सब प्रजागण विद्वान् पुरुषार्थी राजा के साथ मित्रता करके शत्रु से अपनी रक्षा का उपाय करें ॥१॥
टिप्पणी: यह मन्त्र ऊपर आचुका है-अ० १९।२४।७ ॥ १-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० १९।२४।७ ॥