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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले जन] (तुभ्य) तेरे लिये (इत्) ही (स्वे) अपने (ओक्ये) घर में (पीतये) पीने को (सोमम्) सोमरस [महौषधि] (चोदयामि) भेजता हूँ। (एषः) यह (ते) तेरे (हृदि) हृदय में (रारन्तु) अत्यन्त रमे ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य उत्तम-उत्तम पदार्थों को रुचि के साथ खावें, जिससे हृदय में उत्तम रस उत्पन्न होकर सब शरीर में फैले और बल बढ़े ॥८॥
टिप्पणी: ८−(तुभ्य) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। विभक्तेर्लुक्। तुभ्यम् (इत्) एव (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् (स्वे) स्वकीये (ओक्ये) ऋहलोर्ण्यत्। पा० ३।१।१२४। उच समवाये-ण्यत् कुत्वं च। ओकसि। गृहे (सोमम्) महौषधिरसम् (चोदामि) प्रेरयामि (पीतये) पानाय (एषः) सोमः (रारन्तु) रमु क्रीडायाम्-यङ्लुकि लोट्, नुमभावश्छान्दसः सांहितिको दीर्घः। भृशं रमताम् (ते) तव (हृदि) हृदये ॥
