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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] (नः) हमारे (इमम्) इस (वृषभिः) बलवानों करके (सुतम्) सिद्ध किये गये (गवाशिरम्) पृथिवी पर फैले हुए (च) और (यवाशिरम्) अन्न के भोजनवाले पदार्थ को (आगत्य) आकर (पिब) पी ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य संसार के बीच उत्तम पदार्थों का भोजन-पान करके बलवान् होवें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(इमम्) (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् (गवाशिरम्) म० १। पृथिव्यां व्याप्तम् (यवाशिरम्) अशेर्नित्। उ० १।२। यव+आङ्+अश भोजने-किरन्। अन्नभोजनयुक्तं पदार्थम् (च) (नः) अस्माकम् (पिब) (आगत्य) अस्मान् प्राप्य (वृषभिः) बलवद्भिः (सुतम्) साधितम् ॥
