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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (कवे) हे विद्वान् ! (त्वा) तुझको (हि) ही (धनंजयम्) धन जीतनेवाला और (वाजेषु) सङ्ग्रामों में (दधृषम्) अत्यन्त निर्भय (विद्म) हम जानते हैं। (अध) इसलिये (ते) तेरे लिये (सुम्नम्) सुख की (ईमहे) हम प्रार्थना करते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य धनी, शूर और परोपकारी होवे, उसके लिये सुख पहुँचाने को सब प्रयत्न करें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(विद्म) वयं जानीमः (हि) एव (त्वा) त्वाम् (धनञ्जयम्) अ० ३।१४।२। धनस्य जेतारम् (वाजेषु) सङ्ग्रामेषु (दधृषम्) ञिधृषा प्रागल्भ्ये यङ्लुकि पचाद्यच्। अतिप्रगल्भम् (कवे) हे मेधाविन्-निघ० ३।१। (अध) अथ। अतः (ते) तुभ्यम् (सुम्नम्) सुखम् (ईमहे) याचामहे ॥
