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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] को (सोमस्य) सोमरस [महौषधि] के (पीतये) पीने के लिये (स्तोमैः) स्तुतियों के साथ (इह) यहाँ (हवामहे) हम बुलाते हैं। वह (उक्थेभिः) अपने उपदेशों के साथ (कुवित्) बहुत बार (आगमत्) आवे ॥४॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग विद्वानों के बुलाने से प्रसन्न होकर जाया-आया करें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं पुरुषम् (सोमस्य) महौषधिरसस्य (पीतये) पानाय (स्तोमैः) स्तोत्रैः (इह) अत्र (हवामहे) आह्वयामः (उक्थेभिः) कथनीयोपदेशैः (कुवित्) म० २। बहुवारम् (आगमत्) गमेर्लेटि अडागमः। आगच्छेत् ॥
