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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इत्था) इस प्रकार से (मम) मेरी (इषिताः) प्रेरणा की गयीं (गिरः) वाणियाँ (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष] को (सोमपीतये) सोमरस [उत्तम ओषधि] पीने के लिये (आवृते) घूमने को (अच्छ) अच्छे प्रकार (इतः) यहाँ से (अगुः) गयी हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग विद्वानों का सत्कार उत्तम रीति से करते रहें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं पुरुषम् (इत्था) अनेन प्रकारेण (गिरः) वाण्यः (मम) (अच्छ) सुरीत्या (अगुः) इण् गतौ-लुङ्। अगमन्। प्राप्ताः (इषिताः) प्रेरिताः (इतः) अस्मात् स्थानात् (आवृते) वृतु वर्तने-सम्पदादिः क्विप्। आवर्तनाय। आगमनाय (सोमपीतये) महौषधिरसस्य पानाय ॥
