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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले विद्वान्] तू (ग्रावभिः) पण्डितों करके (सुतम्) सिद्ध किये हुए (बर्हिष्ठाम्) उत्तम आसन पर रक्खे हुए (तम्) उस (मदम्) कल्याणकारक पदार्थ को (नु) शीघ्र (आ) सब प्रकार (गहि) प्राप्त हो, वे [पण्डित लोग] (कुवित्) बहुत प्रकार से (अस्य) इस [कल्याणकारक पदार्थ] का (तृप्णवः) हर्ष पानेवाले हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग प्रीति के साथ एक-दूसरे को उत्तम पदार्थों का दान करके आनन्द पावें ॥२॥
टिप्पणी: २−(तम्) प्रसिद्धम् (इन्द्रः) (मदम्) मदी हर्षे-अच्। कल्याणकरं पदार्थम् (आ) समन्तात् (गहि) प्राप्नुहि (बर्हिष्ठाम्) बर्हिस्+ष्ठा गतिनिवृत्तौ-क्विप्। बर्हिषि उत्तमासने स्थितम् (ग्रावभिः) अ० ३।१०।। गॄ विज्ञापने स्तुतौ च-क्वनिप्। शास्त्रविज्ञापकैः पण्डितैः (सुतम्) संस्कृतम् (कुवित्) बहुनाम-निघ० ३।१। बहुप्रकारेण (नु) क्षिप्रम् (अस्य) कल्याणकरस्य पदार्थस्य (तृप्णवः) त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः। पा० ३।२।१४०। तृप प्रीणने-क्नु। तृप्तिशीलाः ॥
