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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (हरिप्रिय) हे मनुष्यों के प्रिय ! [अपने को] (अस्मत्) हमसे (आरे) दूर (मा वि मुमुचः) कभी न छोड़, (अर्वाङ्) इधर चलता हुआ (याहि) चल। (स्वधावः) हे बहुत अन्नवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (इह) यहाँ (मत्स्व) आनन्द कर ॥८॥
भावार्थभाषाः - जहाँ पर राजा और प्रजा प्रीति के साथ रहते हैं और कोई किसी को नहीं छोड़ते, उस राज्य में अन्न आदि बढ़ते रहते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(मा) निषेधे (आरे) दूरे (अस्मत्) अस्मत्तः (वि) वियुज्य (मुमुचः) मुच्लृ मोक्षणे ण्यन्तस्य छान्दसे लुङि चङि रूपम्, अभ्यासस्य दीर्घाभावः, माङ्योगेऽडभावः। मोचय-आत्मानम् (हरिप्रिय) हरयो मनुष्य-नाम-निघ० २।३। हरीणां मनुष्याणां प्रिय हितकर (अर्वाङ्) अभिमुखं गच्छन् (याहि) गच्छ (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (स्वधावः) बह्वन्नवन् (मत्स्व) आनन्द (इह) अत्र ॥
