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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (सः) सो तू (हि) ही (तन्वा) अपने शरीर के साथ (महे) बड़े (राधसे) धन के लिये (अन्धसः) अन्न से (मन्दस्व) आनन्द कर, और (स्तोतारम्) स्तुति करनेवाले विद्वान् को (निदे) निन्दा के लिये (न) मत (करः) कर ॥६॥
भावार्थभाषाः - शरीर और आत्मा की उन्नति चाहनेवाला पुरुष विद्वानों की निन्दा कभी न करे ॥६॥
टिप्पणी: ६−(सः) स त्वम् (मन्दस्व) आनन्द (हि) अवश्यम् (अन्धसः) अन्नात् (राधसे) संसाधकाय धनाय (तन्वा) शरीरेण (महे) महते (न) निषेधे (स्तोतारम्) स्तावकं विद्वांसम् (निदे) णिदि कुत्सायाम्-क्विप्, नुमभावः। निन्दायै (करः) करोतेर्लेटि, अडागमः। कुर्याः ॥
