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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (मतयः) बुद्धिमान् लोग (सोमपाम्) ऐश्वर्य के रक्षक (उरुम्) महान्, (शवसः) बल के (पतिम्) पालनेवाले (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवान् राजा] को (रिहन्ति) पियार करते हैं, (न) जैसे (मातरः) मातेँ [गौएँ] (वत्सम्) बछड़े को ॥॥
भावार्थभाषाः - जैसे गौएँ अपने बछड़ों से प्रीति करती हैं, वैसे ही बुद्धिमान् लोग न्यायकारी राजा से प्रीति करें ॥॥
टिप्पणी: −(मतयः) मेधाविनः-निघ० ३।१। (सोमपाम्) ऐश्वर्यरक्षकम् (उरुम्) महान्तम् (रिहन्ति) रिहतिरर्चतिकर्मा-निघ० ३।१४। कामयन्ते (शवसः) बलस्य (पतिम्) पालकम् (इन्द्रम्) परमैश्वर्यवन्तं राजानम् (वत्सम्) गोशिशुम् (न) इव (मातरः) जनन्यो गावः ॥
