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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वृत्रहन्) हे धन रखनेवाले ! (गिर्वणः) हे स्तुतियों से सेवनीय (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (एषु) इन (सवनेषु) ऐश्वर्यों में, (स्तोमेषु) बड़ाइयों में और (उक्थेषु) वचनों में (नः) हमें (रारन्धि) रमा ॥४॥
भावार्थभाषाः - राजा प्रयत्न करे कि सब लोग मन, वचन, कर्म से पुरुषार्थ करके सुखी रहें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(रारन्धि) रमतेर्लोटि शपः श्लुः, हेर्धिः, अन्तर्गतण्यर्थः। रमय (सवनेषु) ऐश्वर्येषु (नः) अस्मान् (एषु) (स्तोमेषु) प्रशंसासु (वृत्रहन्) वृत्रं धननाम-निघ० २।१०। हन्तिर्गतिकर्मा-निघ० २।१४। हे धनप्रापक (उक्थेषु) वचनेषु (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (गिर्वणः) अ० २०।१।४। हे स्तुतिभिः सेवनीय ॥
