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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ब्रह्मवाहः) हे अन्न पहुँचानेवाले ! (इमा) यह (ब्रह्म) वेदज्ञान (क्रियन्ते) किये जाते हैं, (बर्हिः) उत्तम आसन पर (आ सीद) बैठ। (शूर) हे शूर ! [दुष्टनाशक] (पुरोडाशम्) अच्छे बने हुए अन्न का (वीहि) भोजन कर ॥३॥
भावार्थभाषाः - प्रजागण अन्नदाता राजा को उत्तम आसन पर बैठा कर और उत्तम पदार्थ भेंट करके वेद अनुकूल निवेदन करें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(इमा) इमानि (ब्रह्म) ब्रह्माणि। वेदज्ञानानि (ब्रह्मवाहः) वसेर्णित्। उ० ४।२१८। वह प्रापणे-असुन् णित्। ब्रह्म अन्ननाम-निघ० २।७। हे अन्नप्रापक। अन्नदातः (क्रियन्ते) अनुष्ठीयन्ते (बर्हिः) उत्तमासनम् (आसीद) उपविश (वीहि) (भक्षय) (शूर) हे दुष्टनाशक (पुरोडाशम्) अ० ८।८।२२। सुसंस्कृतमन्नम् ॥
