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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वज्रिणे) वज्रधारी (इन्द्राय) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले राजा] के लिये (गावः) वेदवाणियों ने (आशिरम्) सेवने वा पकाने योग्य पदार्थ [दूध, दही, घी आदि] को और (मधु) मधुविद्या [यथार्थ ज्ञान] को (दुदुह्रे) भर दिया है। (यत्) जब कि उसने [उन वेदवाणियों] को (उपह्वरे) अपने पास (सीम्) सब प्रकार (विदत्) पाया ॥६॥
भावार्थभाषाः - ऐश्वर्यवान् पुरुष वेदवाणियों से सुशिक्षित होकर दूध आदि भोग्य पदार्थ प्राप्त करके यथार्थ ज्ञान बढ़ावे ॥६॥
टिप्पणी: ६−(इन्द्राय) परमैश्वर्यवते राज्ञे (गावः) वेदवाण्यः (आशिरम्) अपस्पृधेथामानृचु०। पा० ६।१।३६। आङ्+श्रिञ् सेवायां श्रीञ् पाके वा-क्विप्, धातोः शिर इत्यादेशः। यद्वा। अशेर्नित्। उ० १।२। आङ्+अश भोजने अशू व्याप्तौ वा-किरन् नित्। आशीराश्रयणाद् वाश्रपणाद् वा, अथेयमितराशीराशास्तेः-निरु० ६।८। आश्रययोग्यं परिपाकयोग्यं वा दुग्धदधिघृतादिपदार्थम् (दुदुह्रे) दुह प्रपूरणे लिटि रुट्। दुदुहिरे। पूरितवत्यः (वज्रिणे) वज्रधारिणे (मधु) मधुविद्याम्। यथार्थज्ञानम् (यत्) यदा (सीम्) अवितॄस्तृ० तु० ३।१९। षिञ् बन्धने-ईप्रत्ययः। सीमिति परिग्रहार्थीयो वा पदपूरणो वा सर्वत इति वा-निरु० १।७। सर्वतः (उपह्वरे) उप+ह्वृ कौटिल्ये-अप्। निकटे। युद्धे (विदत्) विद्लृ लाभे-लुङ्। प्राप्तवान् स इन्द्रस्ता वाणीः ॥
