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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (त्वा) तुझको (मा) न तो (मूराः) मूढ़ (अविष्यवः) हिंसा चाहनेवाले और (मा) न (उपहस्वानः) ठट्ठा करनेवाले लोग (आ दभन्) कभी दबावें। तू (ब्रह्मद्विषः) वेद के वैरियों को (माकीम्) मत (वनः) सेवन कर ॥२॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् राजा सदा श्रेष्ठ कर्म करे, जिससे कोई दुष्ट उसका उपहास आदि न कर सके ॥२॥
टिप्पणी: २−(मा) निषेधे (त्वा) त्वाम् (मूराः) मूढाः-निरु० ६।८ (अविष्यवः) अ० ११।२।२। अव हिंसायाम्-इसि, क्यच्, उप्रत्ययः। परहिंसेच्छवः (मा) निषेधे (उपहस्वानः) उप+हसतेः-वनिप्। उपहासकर्तारः (आ) समन्तात् (दभन्) दम्भु दम्भे-लुङ्। हिंसन्तु (माकीम्) निषेधे। मा शब्दार्थे (ब्रह्मद्विषः) वेदद्वेष्टॄन् (वनः) वन संभक्तौ-लङ्। भजेथाः ॥
