मनुष्यों के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (अबन्धुना) बन्धुहीन और (सुश्रवसा) बड़ी कीर्तिवाले पुरुष के साथ, (श्रुतः) विख्यात (त्वम्) तूने (एतान्) इन (द्विः दश) दो बार दश [बीस] (जनराज्ञः) नीच लोगों के राजाओं को और (षष्टिम् सहस्रा) साठ सहस्र (नव नवतिम्) नौ नब्बे [९+९०=९९ अथवा ९*९०=८१० अर्थात् ६००,९९ अथवा ६०,८१०] (उपजग्मुषः) [उनके] साथियों को (दुष्पदा) न पकड़ने योग्य [अति शीघ्रगामी] (रथ्या) रथ के पहिये के समान (चक्रेण) चक्र [हथियार विशेष] से (नि अवृणक्) उलट-पलट कर दिया है ॥९॥
भावार्थभाषाः - प्रतापी बलवान् राजा शरणागत अनाथों और धार्मिक प्रसिद्ध पुरुषों की रक्षा करके बीसियों प्रधान शत्रुओं और उनकी सहस्रों सेनाओं को अपने चक्र आदि हथियारों से उखाड़ दे, जैसे वेग चलनेवाले रथ के पहियों से भूमि उखड़ जाती है ॥९॥