पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला राजा] (सर्वाभ्यः) सब (आशाभ्यः) आशाओं [गहरी इच्छाओं] के लिये (अभयम्) अभय (परि) सब ओर से (करत्) करे। वह (शत्रून् जेता) शत्रूओं को जीतनेवाला और (विचर्षणिः) विशेष देखनेवाला है ॥७॥
भावार्थभाषाः - राजा अपने न्याययुक्त प्रबन्ध से विघ्नों को हटाकर प्रजा की उन्नति की गहरी इच्छाओं को पूरा करे ॥७॥
टिप्पणी: ७−(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (आशाभ्यः) अभिलाषाणां सिद्धये (परि) सर्वतः (सर्वाभ्यः) (अभयम्) भयराहित्यम् (करत्) कुर्यात् (जेता) न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम्। पा० २।३।६९। इति तृनन्तत्वात् ष्ठ्यभावः। विजयन् (शत्रून्) (विचर्षणिः) म० । विशेषद्रष्टा ॥
