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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाला राजा] (च) निश्चय करके (नः) हमें (मृलयाति) सुखी करे, (अघम्) पाप (नः) हमको (पश्चात्) पीछे (न) न (नशत्) नाश करे। (भद्रम्) कल्याण (नः) हमारे लिये (पुरस्तात्) आगे (भवाति) होवे ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्यों को योग्य है कि धर्मात्मा राजा के प्रबन्ध में रहकर पापों से बचकर सुख भोगें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (च) अवधारणे (मृलयाति) डस्य लः। मृडयाति सुखयेत् (नः) अस्मान् (न) निषेधे (नः) अस्मान् (पश्चात्) पश्चात् काले (अघम्) पापम् (नशत्) नाशयेत् (भद्रम्) कल्याणम् (भवाति) भूयात् (नः) अस्मभ्यम् (पुरः) पुरस्तात् (अग्रे) ॥
