पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अङ्ग) हे विद्वान् ! (इन्द्रः) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले राजा] ने (महत्) बड़े और (अभि) सब ओर से (सत्) वर्तमान (भयम्) भय को (अप चुच्यवत्) हटा दिया है। (सः हि) वही (स्थिर) दृढ़ और (विचर्षणिः) विशेष देखनेवाला है ॥॥
भावार्थभाषाः - राजा दृढ़स्वभाव और सावधान रहकर दुष्टों से प्रजा की रक्षा करे ॥॥
टिप्पणी: मन्त्र -७ ऋग्वेद में है-२।४१।१०-१२ और मन्त्र सामवेद में हैं-पू० ३।१।७ ॥ −(इन्द्रः) परमैश्वर्यवान् राजा (अङ्ग) सम्बोधने (महत्) अधिकम् (अभि) सर्वतः (सत्) अस भुवि-शतृ। भवत्। वर्तमानम् (अप) दूरे (चुच्यवत्) च्युङ् गतौ-लुङि णिलोपे, उपधाह्रस्वत्वम्, अडभावः। अपसारितवान् (सः) (हि) एव (स्थिरः) दृढः (विचर्षणिः) विशेषेण द्रष्टा-निघ० ३।११ ॥
