पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शतक्रतो) हे सैकड़ों कर्मों वा बुद्धियोंवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (या) जो (ते) तेरे (इन्द्रियाणि) इन्द्र [ऐश्वर्यवान्] के चिह्न धनादि (पञ्चसु जनेषु) पञ्च [मुख्य] लोगों में हैं। (ते) तेरे (तानि) उन [चिह्नों] को (आ) सब प्रकार (वृणे) मैं स्वीकार करता हूँ ॥२॥
भावार्थभाषाः - बुद्धिमान् धार्मिक राजा बड़े-बड़े अधिकारियों का आदर करके प्रजा की रक्षा करे ॥२॥
टिप्पणी: २−(इन्द्रियाणि) इन्द्रियं धननाम-निघ० २।१०। इन्द्रस्य परमैश्वर्यवतः पुरुषस्य लिङ्गानि धनादीनि (शतक्रतो) म० १ (या) यानि (ते) तव (जनेषु) पुरुषेषु (पञ्चसु) पचि व्यक्तीकरणे-कनिन्। प्रधानेषु (इन्द्रः) (तानि) लिङ्गानि (ते) तव (आ) समन्तात् (वृणे) स्वीकरोमि ॥
