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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (शतक्रतो) है सैकड़ों कर्मों वा बुद्धियोंवाले (इन्द्र) इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] तू (वाजेषु) सङ्ग्रामों में (सासहिः) विजयी (भव) हो, (त्वा) तुझसे (वृत्राय हन्तवे) शत्रु को मारने के लिये (ईमहे) हम प्रार्थना करते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - सब योधाजन प्रधान सेनापति की आज्ञा से अपने-अपने पद पर स्थिर रहकर शत्रुओं को जीतें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(वाजेषु) सङ्ग्रामेषु (सासहिः) षह अभिभवे-किप्रत्ययः। अभिभविता। विजयी (भव) (त्वाम्) (ईमहे) प्रार्थयामहे (शतक्रतो) हे बहुकर्मन्, बहुषह (इन्द्र) (वृत्राय) शत्रुम् (हन्तवे) म० । हन्तुम् ॥
