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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुहूतम्) बहुतों से पुकारे गये (इन्द्रम्) इन्द्र [परम ऐश्वर्यवाले राजा] को (वृत्राय हन्तवे) शत्रु के मारने के लिये (भरेषु) संग्रामों में (वाजसातये) धनों के पाने को (उप) समीप में (ब्रुवे) मैं कहता हूँ ॥॥
भावार्थभाषाः - सङ्ग्राम प्रवृत्त होने पर सब योधा लोग और सेनाध्यक्ष पुरुष प्रयत्न करें कि शत्रुओं को हराकर सब प्रकार विजय होवे ॥॥
टिप्पणी: −(इन्द्रम्) परमैश्वर्ययुक्तं राजानम् (वृत्राय) वृत्रं शत्रुम् (हन्तवे) तवेन् प्रत्ययः। हन्तुम् (पुरुहूतम्) बहुभिराहूतम् (उप) समीपे (ब्रुवे) कथयामि (भरेषु) सङ्ग्रामेषु (वाजसातये) धनानां लाभाय ॥
