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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [परम ऐश्वर्यवाले सेनापति] (वार्त्रहत्याय) वैरियों के मारनेवाले (च) और (पृतनाषाह्याय) सङ्ग्राम में हरानेवाले (शवसे) बल के लिये (त्वा) तुझको (आ वर्तयामसि) हम अपनी ओर घुमाते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - युद्धकुशल सेनापति सेनाजनों को उत्साही करके शत्रुओं को जीते ॥१॥
टिप्पणी: यह सूक्त ऋग्वेद में है-३।३७।१-७ और मन्त्र १ यजुर्वेद में है-१८।६८ ॥ १−(वार्त्रहत्याय) तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। इत्यण्। शत्रुहनननिमित्ताय (शवसे) बलाय (पृतनाषाह्याय) शकिसहोश्च। पा० ३।१।९९। षह अभिभवे-यत्, षत्वं दीर्घत्वं च। सङ्ग्रामे पराभवसमर्थाय (च) (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् सेनापते (त्वा) त्वाम् (आ वर्तयामसि) आवर्तयामः। अभिमुखं कुर्मः ॥
