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देवता: इन्द्रः ऋषि: वसिष्ठः छन्द: गायत्री स्वर: सूक्त-१८

त्वं वर्मा॑सि स॒प्रथः॑ पुरोयो॒धश्च॑ वृत्रहन्। त्वया॒ प्रति॑ ब्रुवे यु॒जा ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

त्वम् । वर्म । असि । सऽप्रथ: । पुर:ऽयोध: । च । वृत्रऽहन् ॥ त्वया । प्रति । ब्रुवे । युजा ॥१८.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:18» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (वृत्रहन्) हे दुष्टनाशक ! (त्वम्) तू (सप्रथः) चौड़े (वर्म) कवच [के समान] (च) और (पुरोयुधः) सामने से युद्ध करनेवाला (असि) है। (त्वया युजा) तुझ मिलनसार के साथ [वैरियों को] (प्रति ब्रुवे) मैं ललकारता हूँ ॥६॥
भावार्थभाषाः - धर्मात्मा वीर राजा के साथ होकर प्रजागण शत्रुओं को मारें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(त्वम्) (वर्म) कवचमिव (असि) (सप्रथः) सविस्तारम् (पुरोयुधः) उग्रतो योद्धा (च) (वृत्रहन्) हे दुष्टनाशक (त्वया) (प्रति ब्रुवे) प्रत्यक्षं प्रतिकूलं वा कथयामि भर्त्सयामि (युजा) संगन्त्रा। मित्रेण ॥