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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (अर्यः) स्वामी तू (नः) हमको (निदे) निन्दक के, (च) और (वक्तवे) बकवादी (अराव्णे) अदानी पुरुष के (मा रन्धीः) वश में मत कर। (त्वे) तुझमें (अपि) ही (मम) मेरी (क्रतुः) बुद्धि है ॥॥
भावार्थभाषाः - राजा प्रजा में श्रेष्ठ कर्मों का प्रचार करे और गुणों में दोष लगानेवाले निन्दकों को हटावे ॥॥
टिप्पणी: −(मा) निषेधे (नः) अस्मान् (निदे) निन्दकाय (च) (वक्तवे) सितनिगमि०। उ० १।६९। वच परिभाषणे-तुन्। परुषभाषिणे। बकवादिने (अर्यः) स्वामी त्वम् (मा रन्धीः) रध हिंसापाकयोः-लुङ्। रधिजभोरचि। पा० ७।१।६१। इति नुमागमः। रध्यतिर्वशगमनेऽपि-निरु० १०।४०। मा नाशय। मा वशीकुरु (अराव्णे) रा दाने-वनिप्। अदानिने (त्वे) त्वयि (अपि) एव (क्रतुः) प्रज्ञा (मम) ॥
