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आ॑प्रुषा॒यन्मधु॑ना ऋ॒तस्य॒ योनि॑मवक्षि॒पन्न॒र्क उ॒ल्कामि॑व॒ द्योः। बृह॒स्पति॑रु॒द्धर॒न्नश्म॑नो॒ गा भूम्या॑ उ॒द्नेव॒ वि त्वचं॑ बिभेद ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

आऽप्रुषायन् । मधुना । ऋतस्य । योनिम् । अवऽक्षिपन् ।अर्क: । उल्काम्ऽइव । द्यौ: ॥ बृहस्पति: । उद्धरन् । अश्मन: । गा: । भूम्या: । उद्नाऽइव । वि । त्वचम् । बिभेद ॥१६.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:16» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

विद्वानों के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (मधुना) ज्ञान के साथ (ऋतस्य) सत्य के (योनिम्) घर [वेद] को (आप्रुषायन्) सब प्रकार सींचते हुए और (द्योः) आकाश से (उल्काम् इव) उल्का [गिरते हुए चमकते तारे] के समान (अवक्षिपन्) फैलाते हुए और (उद्धरन्) ऊँचे धरते हुए, (अर्कः) पूजनीय (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़ी वेदविद्या के रक्षक महाविद्वान्] ने (अश्मनः) व्यापक [परमात्मा] की (गाः) वाणियों को (वि बिभेद) फैलाया है, (उद्ना इव) जैसे जल से (भूम्याः) भूमि की (त्वचम्) त्वचा को [फैलाते हैं] ॥४॥
भावार्थभाषाः - महाविद्वान् पुरुष विचार के साथ वेदविद्या को बढ़ावे और आकाश से गिरते चमकते तारे के समान प्रकाशमान करे और उच्चभाव के साथ उसे विविध प्रकार फैलावे, जैसे पृथिवी जल से फैलकर उपकारी होती है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(आप्रुषायन्) प्रुष स्नेहनसेचनपूरणेषु-शतृ, विकरणस्य शायजादेशः। सर्वतः सिञ्चन् (मधुना) फलिपाटिनमिमनिजनां०। उ० १।१८। मन ज्ञाने-उप्रत्ययः, नस्य धः। ज्ञानेन (ऋतस्य) सत्यस्य (योनिम्) गृहम्। वेदम् (अवक्षिपन्) विस्तारयन् (अर्कः) पूजनीयः (उल्काम्) रेखाकारे गगनात् पतत्तेजःपुञ्जम् (इव) यथा (द्योः) आकाशात् (बृहस्पतिः) (उद्धरन्) ऊर्ध्वं स्थापयन् (अश्मनः) अशिशकिभ्यां छन्दसि। उ० ४।१४७। अशू व्याप्तौ-मनिन्। व्यापकस्य परमेश्वरस्य (गाः) वाणीः (भूम्याः) पृथिव्याः (उद्ना) उदकेन (इव) यथा (त्वचम्) उपरिदेशम् (वि बिभेद) विस्तारयामास ॥