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देवता: इन्द्रः ऋषि: गोतमः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: सूक्त-१५

अध॑ ते॒ विश्व॒मनु॑ हासदि॒ष्टय॒ आपो॑ नि॒म्नेव॒ सव॑ना ह॒विष्म॑तः। यत्पर्व॑ते॒ न स॒मशी॑त हर्य॒त इन्द्र॑स्य॒ वज्रः॒ श्नथि॑ता हिर॒ण्ययः॑ ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अध । ते । विश्वम् । अनु । ह । असत् । इष्टये । आप: । निम्नाऽइव । सवना । हविष्मत: ॥ यत् । पर्वते । न । सम्ऽअशीत । हर्यत: । इन्द्रस्य । वज्र: । श्नथिता । हिरण्यय: ॥१५.२॥

अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:15» पर्यायः:0» मन्त्र:2


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सभाध्यक्ष के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (अध) फिर (विश्वम्) सब जगत् (हविष्मतः) दानयोग्य पदार्थोंवाले (ते) तेरे (सवना अनु) ऐश्वर्यों के पीछे (इष्टये) अभीष्ट सिद्धि के लिये (ह) निश्चय करके (असत्) होवे, (आपः) जल (निम्नाइव) जैसे नीचे स्थानों के [पीछे बह चलते हैं]। (यत्) जब (इन्द्रस्य) इन्द्र [अत्यन्त ऐश्वर्यवाले सभाध्यक्ष] का (हर्यतः) कमनीय, (श्नथिता) चूर-चूर करनेवाला, (हिरण्ययः) तेजोमय (वज्रः) वज्र [हथियारों का झुण्ड] (पर्वते न) जैसे पहाड़ पर, (सम्-अशीत) वर्तमान हुआ है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे जल ऊँचे स्थान से नीचे स्थान में फैलकर संसार का उपकार करता है, वैसे ही राजा धन का संग्रह करके प्रजापालन करे, और शत्रुओं के मारने में ऐसा दृढ़ उपाय करे, जैसे पहाड़ काटने के लिये दृढ़ हथियार आवश्यक होते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(अध) अथ। अनन्तरम् (विश्वम्) सर्वं जगत् (अनु) अनुसृत्य (ह) निश्चयेन (असत्) भवेत् (इष्टये) अभीष्टसिद्धये (आपः) जलानि (निम्ना) निम्नानि स्थलानि अनुसृत्य (इव) यथा (सवना) ऐश्वर्याणि (हविष्मतः) हवींषि दानयोग्यानि वस्तूनि यस्य (यत्) यदा (पर्वते) शैले (न) यथा (समशीत) शीङ् स्वप्ने-लङ्। गुणाभावः। अशेत। सम्यग् वर्तमानोऽभूत् (हर्यतः) कर्मनीयः (इन्द्रस्य) परमैश्वर्यवतः सभाध्यक्षस्य (वज्रः) आयुधसमूहः (श्नथिता) श्नथ हिंसायाम्-तृन्, नित्वादाद्युदात्तः। हिंसिता। संपेष्टा (हिरण्ययः) तेजोमयः ॥