पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [जैसे] (हस्तिनः) धौंकनीवाले की (दौव) दोनों (दृती) खालें [धोंकनी फैलती हैं] ॥२०॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य विद्या आदि की प्राप्ति से संसार का उपकार करके अपनी कीर्ति फैलावे, जैसे लोहार धौंकनी की खालों को वायु से फुलाकर फैलाता है ॥१७-२०॥
टिप्पणी: २०−(दौव) द्वौ (हस्तिनः) हसिमृग्रिण्०। उ० ३।८६। हसे विकाशे-तन्, इनि। हस्त भस्रा। भस्रावतः पुरुषस्य (दृती) दृणातेर्ह्रस्वः। उ० ४।१८४। दृ विदारणे-तिप्रत्ययः, ह्रस्वश्च। द्वे चर्मनिर्मितपात्रे ॥
