पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य के लिये पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह (उयम्) निश्चय करके (यकांशलोकका) यातना [घोर पीड़ा]वाले भाग का दिखानेवाला [होवे] ॥२०॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग गुणवती स्त्री के सन्तानों को उत्तम शिक्षा देकर महान् विद्वान् और उद्योगी बनावें। ऐसा न करने से बालक निर्गुणी और पीड़ादायक होकर कुत्ते के समान अपमान पाते हैं ॥१-२०॥
टिप्पणी: २०−(उयम्) अव्ययम्। निश्चयेन (यकांशलोकका) कृञादिभ्यः संज्ञायां वुन्। उ० ।३। यत ताडने-वुन्, स च डित्+अंश विभाजने-अच्। कृञादिभ्यः०। उ० ।३। लोक दर्शने-वुन्, विभक्तेराकारः। यकस्य यातकस्य महापीडकस्य अंशस्य लोकको दर्शयिता ॥
