राजा और विद्वानों के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे अग्नि ! [तेजस्वी विद्वान्] (एभिः) इन [घोड़ों] से (सरथम्) एक से रथोंवाले (वा) और (नानारथम्) नाना प्रकार के रथोंवाले [मार्ग] को (अर्वाङ्) सामने होकर (आ याहि) आ, (हि) क्योंकि [तेरे] (अश्वाः) घोड़े (विभवः) प्रबल हैं। और (पत्नीवतः) पालनशक्तियों [सूक्ष्म अवस्थाओं] से युक्त (त्रिंशतम्) तीस (च) और (त्रीन्) तीन [तेंतीस अर्थात् आठ वसु आदि] (देवान्) दिव्य पदार्थों को (अनुष्वधम्) अन्न के लिये (आ) यथावत् (वह) प्राप्त हो, और [सबको] (मादयस्व) हर्षित कर ॥४॥
भावार्थभाषाः - तेंतीस देवता वा दिव्य पदार्थ यह हैं−अग्नि पृथिवी आदि आठ वसु, प्राण, अपान आदि ग्यारह रुद्र, चैत्र आदि बारह आदित्य वा महीने, एक इन्द्र वा बिजुली, एक प्रजापति वा यज्ञ-देखो अथर्ववेद-६।१३९।१। भाव यह है कि विज्ञानी शिल्पी पुरुष इन तेंतीस दिव्य पदार्थों के बाहिरी आकार और भीतरी सूक्ष्म शक्तियों को भली-भाँति समझकर अद्भुत यान-विमान आदि बनाकर संसार को सुख पहुँचावें ॥४॥