उदु॒ ब्रह्मा॑ण्यैरत श्रव॒स्येन्द्रं॑ सम॒र्ये म॑हया वसिष्ठ। आ यो विश्वा॑नि॒ शव॑सा त॒तानो॑पश्रो॒ता म॒ ईव॑तो॒ वचां॑सि ॥
पद पाठ
उत् । ऊं इति ब्रह्माणि । ऐरत । श्रवस्या । इन्द्रम् । समर्ये । महय । वसिष्ठ ॥ आ । य: । विश्वानि । शवसा । ततान । उपऽश्रोता । मे । ईवत: । वचांसि ॥१२.१॥
अथर्ववेद » काण्ड:20» सूक्त:12» पर्यायः:0» मन्त्र:1
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (श्रवस्या) यश के लिये हितकारी (ब्रह्माणि) वेदज्ञानों को (उ) ही (उत् ऐरत) उन [विद्वानों] ने उच्चारण किया है, (वसिष्ठ) हे अतिश्रेष्ठ ! (इन्द्रम्) इन्द्र [महाप्रतापी सेनापति] को (समर्ये) युद्ध में (महय) पूज। (यः) जिस (उपश्रोता) आदर से सुननेवाले [शूर] ने (ईवतः) उद्योगी (मे) मेरे (विश्वानि) सब (वचांसि) वचनों को (शवसा) बल के साथ (आ) अच्छे प्रकार (ततान) फैलाया है ॥१॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् लोग उपदेश करें कि सब श्रेष्ठ पुरुष शूरवीर धर्मात्मा जन का सत्कार करें, जिससे वह उद्योगी पुरुषों की शिक्षा को संसार में फैलावे ॥१॥
टिप्पणी: मन्त्र १-६ ऋग्वेद में हैं-७।२३।१-६ ॥ १−(उत् ऐरत) ईर गतौ-लङ्। ते विद्वांस उदीरितवन्तः। उच्चारितवन्तः (उ) एव (ब्रह्माणि) वेदज्ञानानि (श्रवस्या) श्रवस्-यत्। श्रवो धनम्-निघ० २।१०। श्रवसे यशसे हितानि (इन्द्रम्) महाप्रतापिनं सेनापतिम् (समर्ये) मर्यो मनुष्यनाम-निघ० २।३। सह वर्तमाने युद्धे (महय) पूजय (वसिष्ठ) वसु-इष्ठन्। हे अतिशयेन वसो श्रेष्ठ (आ) समन्तात् (यः) इन्द्रः सेनापतिः (विश्वानि) सर्वाणि (शवसा) बलेन (ततान) विस्तारयामास (उपश्रोता) आदरेण श्रवणकर्ता (मे) मम (ईवतः) ईङ् गतौ-क्विप्, ईर्गतिः-मतुप्। गतियुक्तस्य उद्योगिनः पुरुषस्य (वचांसि) वचनानि ॥
